रविवार, 4 अक्तूबर 2020

स्वागत भाषण का उत्तर

विश्‍व धर्म महासभा, शिकागो, 11 सितंबर 1893

अमेरिकावासी बहनो तथा भाइयो,

आपने जिस आदर और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया हैं, उसका आभार व्यक्त करने समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा हैं। संसार में संन्यासियों की सब से प्राचीन परंपरा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ; धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ; और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि-कोटि हिंदुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ।

मैं इस मंच पर से बोलनेवाले उन कतिपय वक्ताओं का भी धन्यवाद करना चाहता हूँ, जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय यह बतलाया हैं कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मुझे भी एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने का गर्व का है, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा दी हैं। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्‍वास नहीं करते, वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का वासी होने का अभिमान हैं, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने हृदय में यहूदियों के शुद्धतम शेष-अंश को स्थान दिया था, जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी, जिस वर्ष उनका पवित्र मंदिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था। मुझे ऐसे धर्म का अनुयायी होने का गर्व हैं, जिसने महान् जरथुष्‍ट्र जाति के शेष-अंश को शरण दी और जिसका पालन वह आज तक कर रहा है। भाइयो, मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्‍तियाँ सुनाता हूँ, जिसको पाठ मैं बचपन से कर रहा हूँ और जिसे प्रतिदिन लाखों मनुष्य दोहराते हैं:–

रुचिनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्।

नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥ शिवमहिम्नस्तोत्रम् 7॥

– 'जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न-भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार, हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अंत में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।'

यह महासभा, जो अभी तक आयोजित सबसे भव्य सम्मेलनों में से एक है, स्वतः ही गीता के इस अद्‌भुत उपदेश और जगत् के प्रति उसकी घोषणा का समर्थन करती है:–

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥ गीता 4.11॥

– 'जो कोई मेरी ओर आता हैं - चाहे किसी प्रकार से हो - मैं उसको प्राप्‍त होता हूँ। लोग प्रयत्‍न करके भिन्न मार्ग से अंत में मेरी ही ओर आते हैं।'

सांप्रदायिकता, हठधर्मिता और उससे पैदा होने वाले भीषण धर्मांधता इस सुंदर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं, पृथ्वी बार-बार मानवता के रक्‍त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को विध्वस्त करती और पूरे पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि ये वीभत्स दानवी न होती, तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका अंत समय आ गया हैं, और मैं अपने हृदय के अंतराल से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घंटा-ध्वनि हुई हैं, वह समस्त धर्मांधता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का, तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होनेवाले मानवों की पारस्परिक कटुता का मृत्यु-निनाद सिद्ध हो।

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